बिजनेस लोन या व्यक्तिगत लोन लेते समय दो शब्द- “सिबिल स्को और सिबिल रिपोर्ट” शब्द सुने पड़ते है। कंपनी या बैंक लोन देने से पहले इन दोनों की मांग करते ही हैं। यह किसी भी व्यक्ति के क्रेडिट से जुड़े महत्वपूर्ण दस्तावेज हैं। कभी – कभी ऐसा भी होता है कि बैंक या लोन देने वाली कंपनी सिबिल स्कोर खराब बोलकर लोन देने से मना कर देते है। तो कभी ऐसा भी होता है कि कारोबारी सिबिल रिपोर्ट को ही सिबिल स्कोर समझने के फेर में बैंक या लोन कंपनी सेस उलझ जाते है, जबकि दोनों अलग – अलग होते है। इस ब्लॉग में हम जानेंगे की दोनों में क्या अंतर होता है।

बहुत से कारोबारी सिबिल स्कोर और सिबिल रिपोर्ट के बीच असमंजस हो जाता है। क्या आप भी इन दोनों के बीच असमंजस में पड़े है? अगर आप भी इन दोनों को एक ही मानते है तो आपको इन दोनों के बीच अंतर को समझने की जरूरत है। यह अंतर समझना इसलिए भी जरूरी है क्योंकि इन्हीं के जरिए बैंक और NBFC कंपनियों से लोन मिलता है। आइए सबसे पहले सिबिल स्कोर के बारे में समझते है:

सिबिल रिपोर्ट

यह आपकी क्रेडिट हिस्ट्री का विस्तार से लेखा – जोखा है। इसमें व्यक्तिगत यानी पर्सनल जानकारियां, संपर्क यानी कॉन्टैक्ट नम्बर्स, प्रोफेशन यानी रोजगार की जानकारी, लोन की रकम, क्रेडिट का पूरा ब्योरा इत्यादि जैसी जानकारियां शामिल होती हैं।

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सिबिल स्कोर

सिबिल स्कोर की बात करें तो, सिबिल स्कोर आपके सिबिल रिपोर्ट की 3 अंकों की समरी होती है। इससे आपके क्रेडिट यानी साख का पता लगता है। यह आपकी क्रेडिट हिस्ट्री और पहले के लोन चुकाने के तौर – तरीकों के बारे में बताता है। इस स्कोर के जरिए यह अनुमान लगाने में मदद मिलती है कि लोन लेने के बाद आप लोन वापस कैसे करेंगे। आपका सिबिल स्कोर इस पर भी तय होता है कि आपने अपने पिछले लोन चुकाने में कैसी प्रक्रिया अपनाया है।

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इस तरह देखे तो दोनों यानी सिबिल स्कोर और सिबिल रिपोर्ट दोनों अलग – अलग होती हैं। लेकिन एक बात यह ध्यान में रखना चाहिए की दोनों में अंतर होने के साथ ही दोनों लोन प्राप्त करने में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। लोन देने से पहले बैंक और लोन कंपनी दोनों ही संस्थाएं सिबिल स्कोर और सिबिल रिपोर्ट की मांग करतीं हैं।

टेक्नीकल रूप से देखे तो किसी भी व्यक्ति का सिबिल स्कोर तभी बनता है जब उसके 6 महीने से अधिक के क्रेडिट की जानकारी उपलब्ध हो। लेकिन नए कस्टमर्स के मामले में क्रेडिट हिस्ट्री न होने के कारण स्कोर नही बन पाते तो इस कंडीशन में उन्हें NH/NA (हिस्ट्री उपलब्ध नही है) मिल सकता है।

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जो व्यक्ति अच्छे तरीके से यानी समय पर अपनी EMI चुकाते है उनका क्रेडिट स्कोर बेहतर बनता है। कुछ महत्वपूर्ण पॉइंट्स है जैसे समय पर लोन की किस्तों को चुकाना, क्रेडिट यूटिलाइजेशन लिमिट इत्यादि जैसी चीजों पर ध्यान रखा जाना चाहिए। क्रेडिट स्कोर 300 और 900 के बीच होता है।

अब तक आपने यह अच्छी तरीके से समझ लिया होगा कि सिबिल स्कोर और सिबिल रिपोर्ट  में क्या अंतर होता है। जिनका क्रेडिट स्कोर 900 के जितना पास में यानी 850। 800 या 750 के करीब होता है, उसे उतना ही अच्छा माना जाता है। अगर इन संख्याओं के करीब किसी का क्रेडिट स्कोर होता है तो लोन मंजूर होने की संभावना अधिक बढ़ जाती है।

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