वर्किंग कैपिटल वो राशि होती है जिससे किसी फर्म की क्षमता और शॉर्ट टर्म फाइनेंस के बारे में समझा जाता है. सीधे तौर पर कहें तो वर्तमान संपत्ति और कर्ज के बीच के अंतर को ही वर्किंग कैपिटल कहते हैं.

वर्किंग कैपिटल के घटक (Components)

Source: bankersclub

खाता प्राप्य-

ज्यादातर कंपनियां अपने ग्राहकों को तुरंत अपनी सेवाओं के लिए पे करने की उम्मीद नहीं करती हैं. इस प्रकार इस प्रकार ये अनपेड बिल एक संपत्ति के रूप में बनी रहती है. जो कुछ दिनों बाद कैश में बदली जा सकती है.

खाता प्राप्य को 3 भागों में बांटा जा सकता है.

1.ट्रेड क्रेडिट- अनपेड बिल को एक सेल्स से दूसरी कंपनी तक ट्रांसफर करना ट्रेड क्रेडिट कहलाता है.

2.कंज्यूमर क्रेडिट -अनपेड बिल को सेल्स से अंतिम उपभोक्ता तक ट्रांसफर करना कंज्यूमर क्रेडिट कहलाता है.

3.इन्वेंटरी-  रॉ मटीरियल, तैयार माल और अन्य उत्पादों को अंतिम उपभोक्ता तक पहुंचनाना इन्वेंटरी के अंतर्गत आता है.

कैश- कैश को ज्यादातर बैंक डिपोजिट्स के रूप में ही जमा किया जाता है. ये बैंक डिपोजिट्स ‘डिमांड डिपोजिट्स’ या ‘टाइम डिपोजिट्स’ के रूप में  हो सकते हैं. डिमांड डिपोजिट्स चल संपत्ति की तरह होते हैं क्योंकि कंपनी शॉर्ट टाइम में भी इसका भुगतान कर सकती है. जबकि टाइम डिपोजिट्स में आने वाली संपत्ति को थोड़ी देर बाद भी भुगतान किया जा सकता है.

बिक्री योग्य प्रतिभूतियां-  बिक्री योग्य प्रतिभूतियां, कॉमर्सियल पेपर, कंपनियों द्वारा उपयोग किए जाने वाले असुरक्षित शॉर्ट टर्म फंडिंग का एक महत्वपूर्ण स्रोत है. ऐसी कॉमर्सियल पेपर की सेक्योरिटी की अवधि आमतौर पर कुछ ही महीनों की होती है और ये ब्याज दरों पर एक छोटी सूचना के द्वारा कैश जुटाने के लिए किसी फर्म को सक्षम करते हैं. ये ब्याज दर “बैंक लोन” की तुलना में बहुत कम होता है.

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वर्किंग कैपिटल फॉरमूला

Working Capital= Current Assets —- Current Liabilities.

कार्यशील पूंजी = वर्तमान संपत्ति – वर्तमान देयताएं

कैश कनवर्जन साइकिल-  कैश कनवर्जन साइकिल को इस उदाहरण के द्वारा समझा सकता है. एक कपड़ों का डीलर है जो कई करघे (looms) से कपड़े इकट्ठा करता है. वह करघे से कपास खरीदता है और उनकी रंगाई करता है. रंगाई के बाद, वह कपड़ों के निर्माताओं के लिए उधारी पर कपड़े बेचता है.

यदि आप इस कपड़ा डीलर के लिए एक बैलेंस शीट तैयार करते हैं, तो आप current assets के तहत कनवर्जन साइकिल की शुरुआत में कुछ राशि (रकम) देखेंगे. साइकिल के अगले फेज में कुछ अधूरी वस्तुओं और तैयार माल की सुचि दिखेगी जिसे वर्तमान संपत्ति कहा जा सकता है. सामान को बेचने और ग्राहकों के भुगतान के बाद फर्म को नकद प्राप्त होता है.

इस साइकिल से स्पष्ट है कि प्रोडक्शन के दौरान वर्किंग कैपिटल के घटक बदल सकते हैं लेकिन नेट वर्किंग कैपिटल एक समान रहता है.

वर्किंग कैपिटल साइकिल

वर्किंग कैपिटल को मेजर करने के लिए प्रोडक्शन साइकिल एक अच्छा पैमाना है.

1.  रॉ मटीरियल की खरीद के द्वारा फर्म प्रोडक्शन साइकिल शुरू होता है. प्रोडक्शन साइकिल कच्चे माल का तुरंत भुगतान नहीं करता है. हुई देरी को ‘खाता देय अवधि’ कहा जाता है.

2. फर्म, रॉ मटीरियल को अंतिम उत्पाद में बदलता है और इसे बिक्री पर लगाता है. रॉ मटीरियल और उन्हें बिक्री पर रखने के बीच की अवधि को ‘इन्वेंटरी पीरियड’ कहा जाता है.

3.  फर्म फिर उन वस्तुओं की बिक्री कर ग्राहकों से धन प्राप्त करता है. ग्राहकों को बिक्री से लेकर धन प्राप्त करने के बीच की अवधि को “खाता प्राप्य ‘अवधि  कहा जाता है.  इसलिए, रॉ मटीरियल की खरीद और ग्राहकों से भुगतान की प्राप्ति के बीच कुल लगा समय खाता प्राप्य ‘अवधि और सुचि अवधि का जोड़ है.

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वर्किंग कैपिटल गैप- प्रोडक्शन फर्म में जितना लंबा प्रोडक्शन होगा, इंनवेंट्री में उतना ही कैश आएगा.

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वर्किंग कैपिटल टर्नओवर रेशियो

वर्किंग कैपिटल की उपयोगित को समझने के लिए एक महत्वपूर्ण टर्म है ‘वर्किंग कैपिटल टर्नओनर रेशियो’. यह रेशियो किसी काम का संचाचल करने के लिए एक फर्म द्वारा उपयोग में आने वाली धन राशि और कुल बिक्री के बीच संबंध को दिखाता है.

वर्किंग कैपिटल टर्नओवर रेशियो को बिक्री / कार्यशील पूंजी (Sales/Working Capital) के रूप में गणना की जाती है.

वर्किंग कैपिटल प्रबंधन

कैश का रूपांतरण चक्र को फर्म द्वारा प्रबंधित  किया जा सकता है. जैसे- मान लें कि एक गारमेंट डीलर जो दूसरे गारमेंट डीलर को अपने सामान बेचता है और अपने खाता प्राप्य अवधि को कम कराना चाहता है. वह दूसरे गारमेंट डीलर के ग्राहकों से भुगतान में तेजी लाने के लिए आग्रह कर सकता है. अधिक खर्च से बचने के लिए वह रॉ मटीरियल खरीदने के दौरान भी समझदार हो सकता है और यह सुनिश्चित कर सकता है कि उनके पास कोई अतिरिक्त स्टॉक नहीं है. इस प्रकार, एक फर्म के फाइनेंसियल मैनेजर को वर्किंग कैपिटल के संबंध में सही संतुलन बनाकर रखना चाहिए.

वर्किंग कैपिटल लोन के उद्देश्य किसी भी नॉर्मल बिजनेस साइकिल के दौरान एक फर्म में बहुत अधिक पैसे खर्च हो सकते हैं, जिससे पैसों की कमी आ जाती है. वर्किंग कैपिटल का उद्देश्य बिजनेस को अच्छे तरीके से चलने के लिए फंड्स देकर इस कमी की भरपाई करना है. वर्किंग कैपिटल लोन एक तरह का शॉर्ट टर्म फाइनेंस है.

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शॉर्ट टर्म बिजनेस लोन- वर्किंग कैपिटल की जरूरतों को पूरा करने के लिए कोई भी एक निश्चित अवधि के लिए बिजनेस लोन ले सकता है. फर्म के क्रेडिट हिस्ट्री और रेपुटेशन को देखते हुए इस तरह के लोन का कोलैट्रल फ्री भी किया जा सकता है. वर्किंग कैपिटल लोन का इंटरेस्ट रेट 12से16 परसेंट के तक हो सकता है.

लाइन ऑफ क्रेडिट- एक अच्छा क्रेडिट स्कोर किसी को एक वित्तीय संस्थान से लाइन ऑफ क्रेडिट प्राप्त करने में सक्षम बना सकता है. उधारकर्ता वित्तीय संस्थान  द्वारा उनको निर्दिष्ट ऊपरी सीमा से कोई भी राशि वापस ले सकता है. इसका फायदा ये है कि किसी को भी केवल उधार ली गई वास्तविक राशि पर ही ब्याज का भुगतान करना होता है.

खाता प्राप्य पर लोन 

वर्किंग कैपिटल लोन को सुरक्षित करने के लिए कनफर्म्ड सेल्स ऑर्डर का उपयोग किया जा सकता है. हालांकि, ऐसे लोन केवल एक स्थापित क्रेडिट हिस्ट्री के साथ ही व्यवसायों के लिए उपलब्ध हैं.

ट्रेड क्रेडिटर के द्वारा लोन

कोई भी सप्लायर ट्रेड क्रेडिट की सुविधा उसी को देता जहां से बल्क में ऑर्डर किए गए हों. ऐसी व्यवस्था अक्सर अनौपचारिक होती है लेकिन भारत में वर्किंग कैपिटल लोन के सबसे लोकप्रिय रूपों में से एक है.

 वर्किंग कैपिटल लोन के लिए आवेदन 

कंपनी अधिनियम के अनुसार, ये संस्थाएं वर्किंग कैपिटल लोन के लिए योग्य हैं:

  1. एकल स्वामित्व
  2. भागीदारी
  3. निजी और सार्वजनिक लिमिटेड कंपनियां

वर्किंग कैपिटल के लिए जरूरी दस्तावेज

1.पैन कार्ड

2.आधार कार्ड

3. पिछले 3 वर्षों के लिए आयकर और आय वक्तव्य

4. पिछले 2 वर्षों के लिए ऑडिट रिपोर्ट और ऑडिट फाइनेंशियल

नोट-

  1. शॉर्ट टर्म बिजनेस लोन प्राप्त करने के बारे में अधिक जानने के लिए यहां  क्लिक कर

2. इस पोस्ट को इंग्लिश में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.

 

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