एमएसएमई की नई परिभाषा क्या है? इस सवाल का उत्तर अगर एक शब्द में दें तो – MSME भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ (Backbone) है। MSME सेक्टर को भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ (Backbone) कहने के पीछे कई कारण हैं।

भारतीय उद्योग परिसंघ (Confederation of Indian Industry) द्वारा प्रस्तुत आंकड़ों के अनुसार देश की जीडीपी में सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्योग का महत्वपूर्ण योगदान है। वर्तमान में MSME सेक्टर देश की जीडीपी में 29 प्रतिशत की हिस्सेदारी निभा रहा है।

अगर जीडीपी में हिस्सेदारी को अलग – अलग करके देखे तो यह और स्पष्ट हो जाता है। मैनुफैक्चरिंग सेक्टर में लगभग 6।11 प्रतिशत, सर्विस सेक्टर (सेवा क्षेत्र) में 24।63 प्रतिशत। देश में कुल प्रोडक्ट मैन्युफैक्चरिंग का लगभग 33।4 प्रतिशत योगदान सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्योग क्षेत्र का है।

MSME सेक्टर में रोजगार की बात करें तो देश में कुल सृजित रोजगार में 1 करोड़ 20 लाख के आसपास रोजगार लघु, सूक्ष्म और मध्यम क्षेत्र से रोजगार सृजित होता है। वहीं, भारत से निर्यात (Export) होने का लगभग 45 प्रतिशत MSME सेक्टर का योगदान है।

5 करोड़ अतिरिक्त रोजगार सृजित होने का अनुमान 

वित्त मंत्री श्रीमती निर्मला सीतारमण द्वारा सदन में बजट पेश करते समय यह घोषणा की गई कि ‘अगले 5 वर्षों में देश की अर्थव्यवस्था 5 ट्रिलियन डॉलर की हो जाएगी। इसके साथ ही बजट में बजट में सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्योग (एमएसएमई) के लिए कई योजनाओं का घोषणा की गई।

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MSME सेक्टर के लिए की गई घोषणाओं का स्वागत करते हुए सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्योग (एमएसएमई) मंत्री नितिन गडकरी ने कहा कि देश के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में MSME सेक्टर की हिस्सेदारी अगले पांच साल में मौजूदा 29 फीसदी से बढ़ाकर 50 फीसदी हो जाएगी।

श्री गडकरी का कहना है कि अगले 5 वर्षों में देश की जीडीपी में MSME सेक्टर का योगदान 50 प्रतिशत होगा और 5 करोड़ अतिरिक्त रोजगार सृजन होगा।

एमएसएमई मंत्रालय कब बना?

भारत सरकार द्वारा सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्योगों का देश में योगदान को देखते हुए और इन उद्योगों को सरकारी सहायता उपलब्ध कराने के लिए एक समर्पित मंत्रालय बनाने का निर्णय किया गया। यह मंत्रालय का सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम विकास (MSMED) अधिनियम 2006 के अंतर्गत अस्तित्व में आया।

2006 से सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्योग (एमएसएमई) मंत्रालय कार्यरत है। MSME मंत्रालय का कार्य उद्योगों को परिभाषित करना। उद्योगों के विकास के लिए कार्य करना, योजनाएं लाना और उद्योगों के प्रोत्साहन के लिए कार्य करना है।

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शुरुवाती तौर पर उद्योगों की परिभाषा इस तरह थी

उद्योगों की परिभाषा 2018 से पहले दो तरीके से परिभाषित होती थी। परिभाषा इस बात निर्भर होती थी की उद्योग मैनुफैक्चरिंग सेक्टर का है या सर्विस सेक्टर का है। क्षेत्र पहचान होने के बाद यह देखा जाता था कि संबंधित कारोबार यानी उद्योग में लगने वाली मशीनरी और दूसरे उपकरण की कीमत क्या है? यानी उद्योग में लगने उपकरण और मशीनरी की कीमत के आधार पर उद्योगों की परिभाषा तय होती थी।

मैन्युफैक्चरिंग उद्योग की पुरानी परिभाषा 

  • 25 लाख तक की कीमत तक की के उपकरण और मशीनरी वाले कारोबार को सूक्ष्म उद्योग कहा जाता था।
  • 25 लाख से 5 करोड़ तक की मशीनरी और उपकरण वाले कारोबार की लघु उद्योग कहा जाता ह थे।
  • 5 करोड़ से 10 करोड़ तक के उपकरण और मशीनरी वाले कारोबार को मध्यम उद्योग की श्रेणी में रखा जाता था।
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 सर्विस सेक्टर (सेवा क्षेत्र) की पुरानी परिभाषा 

  • सूक्ष्म उद्योग: 10 लाख तक के उपकरण और मशीनरी वाले कारोबार को कहा जाता था।
  • लघु उद्योग: 10 लाख से 2 करोड़ के बीच की जिन कारोबार में उपकरण और मशीनरी लगी होती है उसे लघु उद्योग के नाम से जाना जाता था।
  • मध्यम उद्योग: जिन कारोबार में 2 करोड़ से 5 करोड़ तक की मशीनरी और उपकरण लगे होते हैं उन्हें मध्यम उद्योग के नाम से जाना जाता था।

2018 में एमएसएमई की नई परिभाषा निर्धारित की गई है

सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम मंत्रालय के तत्कालीन मंत्री गिरिराज सिंह द्वारा संसद में एक विधेयक पेश किया। यह बजट 2018 में पेश किया गया। प्रस्तुत बजट में वर्तमान MSME की परिभाषा को बदलने का प्रस्ताव था।

प्रस्ताव सर्वसम्मति से पास हुआ और MSME की नई परिभाषा मशीनरी और उपकरण के मूल्य के आधार पर न रखकर उद्योग में वार्षिक कारोबार (टर्नओवर) के आधार पर तय कर दिया गया। नई परिभाषा में मैनुफैक्चरिंग और सर्विस सेक्टर के बीच अंतर को भी हटा दिया गया। नई परिभाषा निम्न है:

सूक्ष्म उद्योग: जिस उद्योग में सालाना 5 करोड़ तक का कारोबार (टर्नओवर) होता हो उन्हें सूक्ष्म यानी माइक्रो उद्योग कहा जाता है।

लघु उद्योग: जिन उद्योग में सालाना 5 से 75 करोड़ का कारोबार (टर्नओवर) होता हो उन्हें लघु उद्योग यानी स्माल उद्योग के नाम से जाना जाता है।

मध्यम उद्योग: जिन उद्योगों में सालाना 75 करोड़ से 250 करोड़ के बीच कारोबार (टर्नओवर) होता हो उन्हें मध्यम यानी मीडियम उद्योग के नाम से जाना जाता है।

उद्योगों की परिभाषा में बदलाव पर किसी का सवाल हो सकता है कि आखिर ऐसा क्यों किया गया? तो इस सवाल का उत्तर है- उद्योगों की परिभाषा में बदलाव वैश्विक व्यापार के लिए खुलते रास्तों को देखते हुए किया गया है। वैश्विक स्तर पर उद्योगों की पहचान मशीनरी और उपकरण के मूल्य के आधार पर तय न होकर सालना टर्नओवर के आधार पर तय होती है।

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बदलाव का दूसरा महत्वपूर्ण कारण जीएसटी है। जीएसटी आने से पहले कारोबारियों को कई स्तर पर टैक्स देना होता था लेकिन जीएसटी आने के बाद टैक्स की प्रक्रिया केंद्रीकृत हो गई। उद्योगों की परिभाषा सालाना टर्नओवर के आधार पर होने से टैक्स निर्धारित करने में आसानी होती है और कारोबारियों को भी एक पोर्टल से टैक्स फाइल करने में सहूलियत हुई है।

एमएसएमई को बिजनेस लोन मिलने में भी सहूलियत हुई है

MSME की नई परिभाषा से कारोबारियों को टैक्स भरने में और अपने प्रोडक्ट को वैश्विक स्तर पर निर्यात करने में सहूलियत तो हुई ही है साथ ही बिजनेस लोन पाने में भी आसानी हुई है।

बैंक और बिजनेस लोन देने वाली कंपनियों के लिए सहूलियत हो गई है क्योंकि अब वह सीधे तौर उद्योग का सालाना टर्नओवर पूछ लेती हैं और बिजनेस लोन देने या न देने का निर्णय कर लेती है। पहले उनको उद्योगों में लगने वाले उपकरण और मशीनरी का रिकार्ड रखना पड़ता था।

ZipLoan से एमएसएमई को मिलता है 3 दिन में बिजनेस लोन

MSME कारोबारियों को बिजनेस लोन जरूरत को देखते हुए फिनटेक सेक्टर की प्रमुख एनबीएफसी कंपनी ZipLoan द्वारा 1 से 5 लाख तक का बिजनेस लोन सिर्फ 3 दिन में बिना कुछ गिरवी रखे प्रदान किया जा रहा है।

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