इनकम टैक्स रिटर्न यानी आईटीआर। यह किसी भी व्यक्ति की सालाना आय का सरकारी कागजात होता है। साल में एक बार व्यक्ति अपनी कुल इनकम का एक – एक हिसाब सरकार के समक्ष रखतें हैं।

कई बार कई लोग ऐसा सोचते हैं कि अपनी इनकम का कोई सोर्स छुपा लें यानी उसकी जानकारी सरकार के आयकर विभाग को न दें। कभी – कभी यह बहुत घातक सिद्ध होता है। इनकम टैक्स नोटिस मिल जाता है।

कई लोग अपनी आमदनी पर टीडीएस कटने से परेशान रहते हैं। जबकि असलियत यह है कि जो लोग टैक्स स्लैब में नहीं आते हैं और जब वह आईटीआर फाइल करते हैं तो उनका कटा टीडीएस का पैसा रिफंड हो जाता है।

आपको जानकारी होना चाहिए कि जो लोग 20 प्रतिशत से 30 प्रतिशत के टैक्स स्लैब में आते हैं और उनका किसी बैंक से लेनदेन पर 10 प्रतिशत टीडीएस कटता है तब उनकों ब्याज से होने वाली आय पर टैक्स भरना होता है।

आईटीआर फाइल करते समय गलती कैसे होती है?

कई लोग आईटीआर फाइल करने में गलती से बचने के लिए किसी टैक्स एडवाइजर से सलाह लेते हैं। सलाह लेना अच्छी बात है। लेकिन यहां यह ध्यान देने वाली बात है कि व्यक्ति जो जानकारी देगा उसी के आधार पर टैक्स एडवाइजर सलाह देंगे।

कई बार लोग टैक्स एडवाइजर को अपनी आय से संबंधित गलत जानकारी दे देते हैं। तब तो टैक्स एडवाइजर कुछ नहीं कहता है। लेकिन जब आईटीआर फाइल करते हैं और जरूरी इनकम का सोर्स का उल्लेख नहीं करते हैं तब दिक्कत होने शुरु हो जाती है।

आयकर विभाग से नोटिस भी मिल जाता है। तब फिर व्यक्ति टैक्स एडवाइजर के पहुंचकर सलाह मांगते हैं। ऐसे में महत्वपूर्ण यह है कि बाद में परेशानी झेलने से अच्छा ही कि व्यक्ति जब आईटीआर फाइल करें तभी आय संबंधित सभी जानकारी प्रदान कर दें। जिससे कि आगे दिक्कतों का सामना न करना पड़े।

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आपको जानकारी के लिए बता दें कि बैंक डिपॉजिट, बॉन्ड और पोस्ट ऑफिस की ज्यादातर स्कीम से मिले ब्याज (इंटरेस्ट) पर इनकम टैक्स चुकाना जरूरी होता है। आइये जानते हैं कि आईटीआर फाइल करते वक्त किन जानकरियों को बनाता आवश्यक है।

आईटीआर फाइल करते वक्त इन सभी इनकम को बताइए

इनकम टैक्स रिटर्न फाइल करने वाली वेबसाइट (वेब पोर्टल) ने एक सर्वे में पाया है कि ऑनलाइन आईटीआर फाइल करने वाले 80 फीसदी करदाताओं ने अपने रिटर्न में ब्याज से होने वाली इनकम का जिक्र नहीं किया।

आयकर विभाग के नियमों के अनुसार ब्याज से हुई इनकम का आईटीआर में जिक्र नहीं करना गैरकानूनी है। इसके खिलाफ नोटिस दी जा सकती है।

वहीं बैंक में जमा रकम पर ब्याज के रूप में होने वाली इनकम पर इनकम टैक्स चुकाना ज्यादा जरूरी है। यहां यह ध्यान देने वाली बात है कि इनकम टैक्स नहीं चुकाने पर या देरी से कर भुगतान करने के लिए जुर्माना भरना पड़ सकता है।

टैक्स और टीडीएस के असमंजस में न होइए

अक्सर लोग टैक्स और टीडीएस दोनों को एक ही समझ लेते हैं। टीडीएस कटने को ही टैक्स कटना मान लेते हैं। जबकि दोनों दो अलग – अलग चीजें हैं।

इस गलतफहमी में नहीं पड़ना चाहिए कि किसी इनकम वाली रकम पर तो पहले ही कर कटौती (टीडीएस) हो चुकी है तो इनकम टैक्स चुकाने का कोई मतलब नहीं है।

बैंक के सेविंग अकाउंट पर ब्याज

बहुत से लोगों में ब्याज पर टैक्स चुकाने को लेकर असमंजस टैक्स छूट के प्रावधान की वजह से भी है। इनकम टैक्स कानून के सेक्शन 80TTA के हिसाब से अगर किसी के सेविंग अकाउंट (बचत खाता) पर सालाना 10 हजार रुपये इनकम होती है वह टैक्स छूट का लाभ उठा सकते हैं।

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हां यह ध्यान दिलाना आवश्यक है कि बैंक के सेविंग अकाउंट (बचत खाता) से अगर किसी को ब्याज के रुप में 10 हजार रुपये से अधिक इनकम होती है इन्हें इनकम टैक्स चुकाना पड़ेगा।

इसे एक उदाहरण से समझते हैं:

अगर किसी के बैंक खाता में 2.5 लाख रुपये जमा हों तो उस व्यक्ति को चार फीसदी ब्याज दर के हिसाब से को साल में जमा रुपयों पर 10 हजार ब्याज के रुप में मिल जायेगा।

बहुत से करदाता हालांकि इस कैटेगरी में आते ही नहीं हैं। यहां ध्यान रखने वाली बात यह है कि इनकम टैक्स में यह छूट सिर्फ बचत खाते के ब्याज पर मिलती है। फिक्स्ड डिपॉजिट रेकरिंग डिपॉजिट या अन्य जमा पर नहीं।

टैक्स फ्री आमदनी की जानकारी

बैंक में जमा से मिलने वाले ब्याज पर जहां आपको इनकम टैक्स चुकाना है, वहीं बचत खाते से मिलने वाले ब्याज पर भी आंशिक रूप से टैक्स लगाया जा सकता है। अगर यह आमदनी टैक्स फ्री है, तब भी आपको इस बारे में इनकम टैक्स विभाग को जानकारी देनी है।

क्लियर टैक्स के संस्थापक एवं सीईओ अर्चित गुप्ता ने कहा, ‘पब्लिक प्रोविडेंट फंड (PPF) या टैक्स फ्री बांड्स जैसे निवेश को भुनाने पर आपके बैंक अकाउंट में आई रकम के बारे में आपको आईटीआर में जिक्र करना होगा’।

अगर आप आईटीआर-1 में इनकम टैक्स रिटर्न फाइल कर रहे हैं तो कर छूट वाली आमदनी की जानकारी देने के लिए अलग से कॉलम बनाया गया है। अन्य फॉर्म से आईटीआर फाइल करते वक्त आपको शेड्यूल EI (एग्जेंप्टेड इनकम) यानी कर छूट वाली आमदनी का जिक्र करना है।

कुछ इसी तर्ज पर इनकम टैक्स कानून के सेक्शन 10 (34) के तहत डिविडेंड से मिली 10 लाख रुपये तक की रकम टैक्स से मुक्त है। जीवन बीमा पॉलिसी को भुनाने पर मिली रकम भी इनकम टैक्स कानून के सेक्शन 10 (10d) के हिसाब से कर मुक्त आमदनी है। बहुत से करदाता इन मद में मिली छोटी रकम को अनदेखा कर देते हैं।

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विशेषज्ञों का कहना है कि आपको इस आमदनी का जिक्र आईटीआर में करना चाहिए। गुप्ता ने कहा, ‘इस तरह की आमदनी का इनकम टैक्स रिटर्न में जिक्र करने से आप पैसे की आमदनी का स्रोत बता पाएंगे। भविष्य में आप इसे इस्तेमाल करेंगे तो उस समय हो सकता है कि आपको इस बारे में जानकारी देनी पड़े।’

अगर आप बड़ी रकम का ट्रांजेक्शन या खरीदारी करते हैं तो इनकम टैक्स विभाग को उसकी सूचना दी जाती है। अगर आप 8-10 लाख रुपये की कार खरीदें या घर खरीदने में 15 लाख रुपये का डाउन पेमेंट करें तो संबंधित पार्टी को इसकी सूचना आयकर विभाग को देनी होती है।

इसके साथ ही आपको इनकम टैक्स रिटर्न में टैक्स फ्री कैपिटल गेन्स की भी सूचना देनी है। गुप्ता ने कहा, ‘जिन लोगों की आमदनी करयोग्य नहीं है, लेकिन लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन्स से 2.5 लाख या इससे अधिक की कमाई हुई है, उनके लिए इनकम टैक्स रिटर्न फाइल करना जरूरी है।’ इस तरह की इनकम की सूचना सरकार को देना होता है।

इनकम डिपार्टमेंट (कर विभाग) सभी छूट और कर मुक्त आमदनी पर नजर रखता है। ‘वित्त मंत्री ने कहा है कि जो करदाता गलत बिल लगाकर टैक्स छूट लेते हैं, उन पर आयकर विभाग की कड़ी नजर है। इसमें खास तौर पर गलत तरीके से HRA लेने वाले लोग शामिल हैं।’

वेतन से आमदनी वाले ऐसे करदाता के लिए एक लाख रुपये सालाना से अधिक किराया देने पर मकान मालिक का पैन नंबर देना जरूरी है। अगर कोई करदाता हर महीने 50,000 रुपये से अधिक किराया चुका रहा है तो उसे उस पर पांच फीसदी टीडीएस काटना जरूरी है।

 

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