अक्सर ऐसा होता है कि कोई कंपनी/दुकान या फैक्ट्री के बारे में अचानक से न्यूज मिलती है कि वह बंद कर दी गई है. आज की तारीख में कई ऐसे स्टार्ट-अप हैं जो बेहतर प्रदर्शन करते हुए भी अचानक से बंद हो गये. कारण किसी को पता नहीं चलता.

ऐसा अक्सर होता है कि संस्थान की वित्तीय हालत बेहतर होते हुए भी संस्थान अचानक से बंद हो गये गए हो. बेहतर फाइनेंशियल कंडीशन वाले संस्थाओं को अगर केश स्टडी के तौर पर देखे तो इसके कई पोजिटिव और दूरदर्शी परिणाम निकल कर आते हैं.

बेहतर आर्थिक हालत में होते भी किसी का कंपनी या बिजनेस का बंद हो जाने के कारणों में Working Capitalका सही से मैनेजमेंट न करना प्रमुख होता है. एक उद्यमी यानी कारोबारी की व्यवसायिक सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि वह अपने बिजनेस का Working Capital कैसे मैनेज करता है.

Working Capital को कार्यशील पूंजी कहा जाता है-  कार्यशील पूंजी को अगर एक लाइन में समझना होगा – कंपनी की मौजूद कुल संपत्ति और कच्चे माल और तैयार माल की रकम और कारोबार पर बकाया देनदारियों के बीच का अंतर Working Capital यानी कार्यशील पूंजी कहलता है.

वर्किंग कैपिटल का कैलकुलेशन कैसे होता है?

कार्यशील पूंजी यानी Working Capital फ़ॉर्मूला के आधार पर निकाला जाता है. वर्किंग कैपिटल का कैलकुलेशन करने करने का फ़ॉर्मूला निम्न है:

Working Capital = Current Assets – Current Liabilities

कंपनी की वर्तमान संपत्ति (CURRENT ASSET) के टोटल से वर्तमान देनदारी (CURRENT LIABILITIES) को घटाने पर आने वाली संख्या को कार्यशील पूंजी (Working Capital) कहा जाता है.

यहाँ पर वर्तमान संपत्ति (CURRENT ASSET – करंट एसेट) से मलतब है – नगद, बैंक बैलेंस (CASH, BANK BALANCE) ग्राहकों से प्राप्त होने वाली बकाया राशी, बिकने से बचे हुए माल का स्टॉक, और तैयार माल, तथा, वर्तमान देनदारी (CURRENT LIABILITIES – करेंट लाईबिलितिज) से मतलब है – सप्लायर्स (SUPPLIER) और अन्य लोगो को दी जाने वाली बकाया धनराशी, बिजनेस लोन की EMI इत्यादि.

इसे और सरल तरीके से समझते हैं: मान लीजिए, आपके पास 10,00,000 की वर्तमान संपत्ति है  और वर्तमान देनदारी यानी बकाया 8,00,000 हो तो इस कंडीशन में आपके पास 2,00,000 रुपये वर्किंग कैपिटल यानी कार्यशील पूंजी बचती है, जिससे आप अपने बिजनेस का संचालन करेंगे.

वर्किंग कैपिटल 2 तरह का होता है

कार्यशील पूंजी दो तरह के होते हैं।

  • पॉजिटिव वर्किंग कैपिटल – सकारात्मक कार्यशील पूंजी
  • नेगेटिव वर्किंग कैपिटल – नकारात्मक कार्यशील पूंजी

बिज़नस में वर्किंग कैपिटल का महत्व

जैसा कि हमने ऊपर देखा वर्किंग कैपिटल वह पूंजी होती है, जिससे कंपनी अपने दैनिक काम को पूरा करती है, और जिस के कारण बिजनेस बिना किसी खास समस्या के चलता रहता है, तो इस से बिल्कुल स्पष्ट हो जाता है कि किसी भी बिज़नस में वर्किंग कैपिटल कितना महत्व रखता है.

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बिज़नस छोटा हो या बड़ा WORKING CAPITAL का होना बहुत जरुरी है, एक अच्छा और अनुभवी बिजनेसमैन WORKING CAPITAL के महत्व को बहुत अच्छी तरह समझता है, और कोशिश करता है कि – उसे इस तरह की पूंजी की समस्या न हो जिस से कि उसे दैनिक कार्यो को समय से पूरा करने में कोई दिक्कते आये.

वर्किंग कैपिटल डेफिसिट क्या है?What is Working Capital Deficit?

  • कार्यशील पूंजी में डेफिसिट Working Capital वह स्थिति होती है जब बिजनेस की वर्तमान संपत्ति वर्तमान देनदारियों से कम कम होती है. इस स्थिति को नकारात्मक कार्यशील पूंजी – नेगेटिव Working Capital भी कहते हैं.
  • नेगेटिव Working Capital से बचने के लिए कारोबारियों को सलाह दी जाती है कि वह Working Capital लोन लेने का प्रयास करें.
  • Working Capital लोन के जरिये कार्यशील पूंजी के फ्लो को मेंटेन करने में मदद मिलती है.
  • लोन मार्केट में ऐसी कई एनबीएफसी हैं जहां से Working Capital लोन बहुत आसानी से मिल जाता है. प्रमुख एनबीएफसी ZipLoan कंपनी से सिर्फ 3 दिन में 1 से 5 लाख तक का बिजनेस लोन मिल जाता है.

ZipLoan से मिलता है सिर्फ 3 दिन में 5 लाख तक वर्किंग कैपिटल लोन

ZipLoan’ फिनटेक क्षेत्र की प्रमुख NBFC यानी नॉन बैंकिंग फाइनेंशियल कंपनी है। ‘कंपनी द्वारा सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम कारोबारियों को 1 से 5 लाख तक का बिजनेस लोन सिर्फ 3 दिन में प्रदान किया जाता है।

ZipLoan से बिजनेस लोन पाने की शर्ते बहुत कम हैं 

  • बिजनेस कम से कम 2 साल पुराना हो।
  • बिजनेस का सालाना टर्नओवर कम से कम 5 लाख से अधिक का होना चाहिए।
  • पिछले साल भरी गई ITR डेढ़ लाख रुपये की हो या इससे अधिक की होनी चाहिए।
  • घर या बिजनेस की जगह में से कोई एक खुद के नाम पर होना चाहिए।

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