बिजनेस का वर्किंग कैपिटल बढ़ाने के लिए सबसे पहले हमें वर्किंग कैपिटल क्या होता है? इस संबंध में जानकारी प्राप्त कर लेना आवश्यक है। वर्किंग कैपिटल शब्द अंग्रेजी भाषा का है। वर्किंग कैपिटल को हिंदी में कार्यशील पूंजी कहते हैं। कार्यशील पूंजी यानी कार्य को गतिशील रखने वाली पूंजी।

जैसा कि नाम से ही स्पष्ट हो जाता है कि हम किसी ऐसी पूंजी के संबंध में बात कर रहे हैं जिससे कार्य को गतिशील रखने में मदद मिलती है। जी हां! बिल्कुल कुछ ऐसा ही है। कार्यशील पूंजी यानी वर्किंग कैपिटल वह धन होता होता है जिससे बिजनेस को गतिशील रखा जाता है।

अब कई लोगों का यह सवाल हो सकता है कि बिजनेस में लगने वाली सभी पूंजी को हम कार्यशील पूंजी क्यों नहीं कह सकते हैं? बिल्कुल यह सवाल ठीक भी है। लेकिन इस सवाल का उत्तर है कि किसी भी बिजनेस को शुरु करने से लेकर उस बिजनेस को चलाने में अलग – अलग प्रकार के खर्च होता है।

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बिजनेस में सभी खर्च को हम कार्यशील पूंजी यानी वर्किंग कैपिटल नहीं कह सकते हैं। क्योंकि, जो धन बिजनेस में प्राप्त कुल राजस्व में से बिजनेस की कुल देनदारियों को चुकाने के बाद बचता है सिर्फ हम उसे ही वर्किंग कैपिटल यानी कार्यशील पूंजी कह सकते हैं। वर्किंग कैपिटल निकालने का बकायदा एक फ़ॉर्मूला भी है।

वर्किंग कैपिटल का फ़ॉर्मूला

Current Assets – Current Liabilities = Working Capital

बिजनेस की वर्तमान कुल आय – बिजनेस की वर्तमान कुल देनदारी = कार्यशील पूंजी

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आइये अब वर्किंग कैपिटल के फ़ॉर्मूला को विस्तार से समझते हैं:

वर्किंग कैपिटल का फ़ॉर्मूला कहता है कि बिजनेस में वर्तमान में जितने भी सोर्स से इनकम प्राप्त होती है उस इनकम में से बिजनेस के लिए वर्तमान में बकाया देनदारियों को घटा देने पर किसी भी बिजनेस का वर्किंग कैपिटल पूंजी का आंकड़ा प्राप्त हो जाता है।

बिजनेस की वर्तमान कुल इनकम में क्या – क्या शामिल होता है?

जैसा कि पहले ही बताया गया है कि बिजनेस के वर्तमान इनकम में बिजनेस की सभी सोर्स की इनकम शामिल होती है। मतलब किसी बिजनेस का अगर एक से अधिक प्रोडक्ट है तो सभी प्रोडक्ट को बिकने से होने वाली इनकम, मुनाफा इत्यादि सभी को करेंट ऐसेट में शामिल होता है।

बिजनेस की वर्तमान देनदारियों में क्या – क्या शामिल होता है?

जितना यह सत्य है कि बिजनेस में मुनाफा होता है, इसी के साथ यह सभी सत्य है कि एक बिजनेस में कई तरह की देनदारियां भी होती है। देनदारियों से तात्पर्य है- कच्चे माल को चुकाई जाने वाली रकम, अगर बिजनेस पर कोई लोन चल रहा है तो उस लोन की EMI के तौर पर जमा की जाने वाली रकम, बिजनेस के लिए किये गये अग्रिम ऑर्डर के भुगतान की रकम, कर्मचारियों को सैलरी के तौर पर दी जाने वाली रकम, बिजनेस की जगह अगर किराया पर है तो किराए के रुप में दी जाने वाली रकम, कर्मचारियों के ऊपर चाय – नाश्ता इत्यादि पर होने वाला खर्च बिजनेस का देनदारियों में आता है।

बिजनेस में वर्किंग कैपिटल का महत्व

जिस प्रकार गाड़ी बिना ईधन के नहीं चल सकती है ठीक उसी प्रकार वर्किंग कैपिटल के बिना बिजनेस नहीं चल सकता है। एक तरह से हम कह सकते हैं कि किसी भी बिजनेस का वर्किंग कैपिटल ईधन होता है। जैसे गाड़ी का पेट्रोल खत्म होता है तो चलती हुई गाड़ी अचानक से बंद पड़ जाती है। ठीक उसी प्रकार जैसे ही किसी बिजनेस में वर्किंग कैपिटल कम होता है या समाप्त होता है तो बिजनेस एकाएक बंद होने के कगार पर पहुंच जाता है।

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किसी को अंदाजा भी नहीं लगता है कि ठीक – ठाक चलता हुआ बिजनेस अचानक से बंद कैसे हो गया। इस बात का उदाहारण गुरुग्राम और नोएडा जैसे शहरों में देखा जा सकता है। कई ऐसे चमकते हुए स्टार्ट-अप्स अचानक से बंद हो गये। और उन स्टार्ट-अप्स के फाउंडर किसी दूसरी कंपनी में नौकरी करने लगे। ऐसी विकट स्थिति का सामना कई स्टार्ट-अप्स करना पड़ा है।

कारोबारियों के सामने ऐसी विकट स्थिति क्यों आती है? दरअसल जब बिजनेस चल रहा होता है तो पैसा एक तरफ से आता है और एक तरफ से जाता है। कोई इस बात पर ध्यान नहीं देता है कि बिजनेस को चलाने के लिए धन बच रहा है या नहीं। और धीरे – धीरे बिजनेस का वर्किंग कैपिटल सूख जाता है और बिजनेस बंदी के कगार पर पहुंच जाता है।

अपने बिजनेस का वर्किंग कैपिटल कैसे बढ़ाएं?

बिजनेस में वर्किंग कैपिटल यानी कार्यशील पूंजी जुटाने का आदर्श तरीका तो यही होता है कि लेनदारियों और देनदारियों के बाद बचने वाली रकम को वर्किंग कैपिटल के तौर पर आरक्षित कर दिया जाए। ताकि उस धनराशि का उपयोग समय आने पर किया जा सके।

लेकिन, सभी कारोबारियों के साथ ऐसा नहीं हो पाता है। क्योंकि सभी कारोबारियों का अपने बिजनेस का अपना स्केल और तरीका है। किसी के बिजनेस में मार्जिन कम होती है तो किसी के बिजनेस में उधारी बहुत अधिक होती है। ऐसे में वर्किंग कैपिटल जुटाने और बढ़ाने का आदर्श तरीका आजमाना जरा मुश्किल भरा हो सकता है।

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कारोबार में बिजनेस लोन के जरिये वर्किंग कैपिटल बढ़ाने का तरीका सबसे बेहतरीन होता है। जी हां, आज के समय में कई ऐसी वित्तीय कम्पनियां हैं जहां से एमएसएमई कारोबारी अपने बिजनेस का वर्किंग कैपिटल मेंटेन करने के लिए और कार्यशील पूंजी में इजाफ़ा करने के लिए वर्किंग कैपिटल लोन प्राप्त कर सकते हैं। आपको जानकारी के लिए बता दें कि देश की प्रमुख एनबीएफसी ZipLoan द्वारा एमएसएमई कारोबारियों को अपने बिजनेस का वर्किंग कैपिटल बढ़ाने के लिए . लाख रुपये तक का वर्किंग कैपिटल लोन प्रदान किया जाता है।

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ZipLoan के वर्किंग कैपिटल लोन से बढ़ाए बिजनेस का वर्किंग कैपिटल

देश की प्रमुख नॉन बैंकिंग फाइनेंस कंपनी ZipLoan द्वारा इस बात को समझा जाता है कि बिजनेस में वर्किंग कैपिटल का क्या महत्व है। इसीलिए बिजनेस लोन के तौर पर ZipLoan द्वारा छोटे और मध्यम श्रेणी के कारोबारियों को . लाख रुपये तक का वर्किंग कैपिटल लोन, सिर्फ 3 दिन* में प्रदान किया जाता है।

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वर्किंग कैपिटल लोन की पात्रता निम्न है:

  • बिजनेस दो साल से अधिक पुराना होना चाहिए।
  • कारोबार का सालाना टर्नओवर 10 लाख रुपये से अधिक होना चाहिए।
  • बिजनेस के लिए पिछले वित्तीय वर्ष में डेढ़ लाख रूपये से अधिक की आईटीआर फाइल का होना चाहिए।
  • व्यवसाय की जगह या घर की जगह में से कोई एक खुद कारोबारी के नाम पर या कारोबारी के किसी ब्लड रिलेटिव के नाम पर होना चाहिए।
  • घर और बिजनेस दोनों अलग – अलग होना चाहिए।

ZipLoan से वर्किंग कैपिटल पाने के लिए निम्नलिखित कागजातों की आवश्यकता होती है:

  • आधार कार्ड
  • पैन कार्ड
  • पिछले 9 महीने का बैंक स्टेटमेंट (करेंट अकाउंट का बैंक स्टेटमेंट होना चाहिए)
  • फाइल की गई आईटी आर की कॉपी
  • घर या बिजनेस की जगह में से किसी एक का मालिकाना हक़ का प्रूफ। मालिकाना हक का प्रूफ खुद कारोबारी के नाम पर या कारोबारी के किसी ब्लड रिलेटिव के नाम पर हो तो भी मान्य होता है।

ZipLoan से वर्किंग कैपिटल लोन लेने का प्रमुख लाभ

  • वर्किंग कैपिटल लोन की धनराशि का वितरण सिर्फ 3 दिन* के भीतर हो जाता है।
  • कुछ भी गिरवी नहीं रखना होता है।
  • वर्किंग कैपिटल लोन 6 महीने बाद प्री पेमेंट चार्जेस फ्री होता है।
  • टॉप-अप लोन की सुविधा भी प्रदान की जाती है।

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