लोन लेना और लोन देना दोनों फायदे का सौदा है। लोन लेने वाला जहां अपने बाकी काम कर पाता है, वहीं लोन देने वाले को ब्याज मिलता है। यानी लोन कुल रकम तो मिलेगी ही इसके साथ ही उन पैसों पर ब्याज भी मिलता है।

इस तरह से देखा जाये तो यह एक कोलाब्रेशन सिस्टम है। लोन प्राप्त करने वाला व्यक्ति जहां अपने अधूरे काम को कम्प्लीट कर पाता है वहीं देने देने वाली संस्था को ब्याज की रकम हासिल होती है।

इस पूरी प्रक्रिया में हजारों लोगों को रोजगार मिलता है। मार्केट में पैसों का फ्लो बढ़ता है जिसके वजह से देश की अर्थव्यवस्था मजबूत होती है।

हालाँकि लोन एक रिस्की प्रोडक्ट है। लोन में दोनों तरफ रिस्क रहता है। लोन लेने वाला इस बात को लेकर संशय में रहता है कि वह लोन चुका पायेगा या नहीं। वहीं लोन देने वाली संस्था इस बात को लेकर संशय में रहती हैं कि उनका पैसा डूब तो नहीं जायेगा न।

यह शंकाएं ऐसी ही नहीं है। बल्कि इसके पीछे कई ऐसे इतिहास है जिसमे लोन लेने वाला व्यक्ति लोन का पैसा वापस नहीं कर पाता है और उसकी अधिकतर प्रॉपर्टी नीलाम हो जाती है।

वहीं बैंक एनपीए से जूझते हैं। एनपीए यानी नॉन परफार्मिंग एसेट (गैर प्रदर्शन सम्पत्ति) उस स्थिति को कहते हैं जब लोन लेने वाला व्यक्ति लोन को चुकाने में असमर्थ हो चूका हो और लंबे समय तक लोन की EMI न चुकाया हो।

बैंक जब लोन देते हैं तब लोन की धनराशि के बदले प्रॉपर्टी गिरवी रखवाते हैं। ग्राहक द्वारा लोन की राशि न चुकाने स्थिति में जो संपत्ति गिरवी रखी होती है उसे नीलाम करके लोन का पैसा वसूल करने का प्रयास किया जाता है। गिरवी संपति नीलाम करना कोर्ट के आदेशों के अधीन होता है।

ग्राहक अगर लोन की EMI राशि ड्यू डेट के 90 दिन के अंदर नहीं जमा करता है तो उसे एनपीए में डाल दिया जाता है। उस ग्राहक को दिए गए लोन को बैड लोन की कैटेगरी में डाल दिया जाता है। ऐसे ही लोन के कई प्रकार होते हैं।

लोन कितने प्रकार का होता है?

अधिकतर लोग लोन को उधारी का पैसा ही मानते हैं। उनका मानना होता है बस किसी तरह पैसा मिलना चाहिए। लेकिन लोन की भी कैटेगरी होती है। इसे जानना बेहद जरूरी होता है क्योंकि इसी कैटेगरी के आधार पर ही यह तय होता है कि ग्राहक को दुबारा लोन मिलेगा या नहीं मिलेगा।

 

  • स्टैंडर्ड अकाउंट या लोन
  • सब-स्टैंडर्ड एसेट
  • डाउटफुल एसेट
  • लॉस एसेट

स्टैंडर्ड लोन अकाउंट 

जब देनदार द्वारा तय समय पर लोन की राशि का भुगतान बैंक को किया जाता है तो उसका लोन अकाउंट स्टैंडर्ड कहलाता है।

बैंकों की वित्तीय सुरक्षा के लिए आरबीआई के नियमों के अनुसार बैंकों को स्टैंडर्ड लोन के लिए भी प्रोविजन करना होता है।

इसके लिए बैंक स्टैण्डर्ड लोन के 0.40 प्रतिशत के बराबर राशि की प्रोविजनिंग करते हैं। छोटे एवं मध्यम उद्यमों के लिए ये रकम 0.25 परसेंट होती है जबकि कमर्शियल रियल एस्टेट के लिए यह राशि 1% होती है।

सब-स्टैंडर्ड एसेट लोन अकाउंट

जब कोई एसेट 12 महीने या कम समय तक एनपीए रहता है तो उसे सब स्टैंडर्ड एसेट कहा जाता है। इस लोन के लिए बैंक को बकाया राशि के 15 परसेंट के बराबर की प्रोविजनिंग करनी पड़ती है और जिस लोन पर कोई सिक्योरिटी नहीं होती है उसमें बैंक 10 प्रतिशत एक्स्ट्रा की प्रोविजनिंग करता है।

अगर कोई एसेट 12 महीने या कम समय तक एनपीए रहता है तो उसे सब स्टैंडर्ड एसेट कहा जाता है। इस लोन के लिए बैंक को बकाया राशि के 15 परसेंट के बराबर की प्रोविजनिंग करनी पड़ती है और जिस लोन पर कोई सिक्योरिटी नहीं होती है उसमें बैंक 10 प्रतिशत एक्स्ट्रा की प्रोविजनिंग करता है।

डाउटफुल एसेट अकाउंट

अगर कोई एसेट 12 महीने तक सब-स्टैंडर्ड रहता है तो उसे डाउटफुल एसेट की श्रेणी में डाल दिया जाता है। ऐसे लोन की शेष बकाया राशि की वसूली की गुंजाइश बहुत ही कम होती है। इसकी प्रोविजनिंग के दौरान ये देखा जाता है कि लोन कितने साल से डाउटफुल कैटेगरी में है।

अगर कोई लोन 1 साल तक डाउटफुल रहता है तो उसकी 25 परसेंट प्रोविजनिंग होगी, 3 साल तक डाउटफुल रहने पर 40 परसेंट और 3 साल बाद 100 फीसदी प्रोविजनिंग करनी पड़ेगी।

लॉस एसेट अकाउंट

अगर सब स्टैण्डर्ड के बाद भी 3 साल से ज़्यादा समय तक में बैंक को लोन नहीं चुकाया जाता है तो बैंक इसे अन-रिकवरेबल करार दे देता है और इसे लॉस एसेट कहा जाता है लेकिन लॉस एसेट करार दिए जाने के लिए ये जरुरी है कि इनर और आउटर ऑडिटर इसे लॉस एसेट के तौर पर प्रमाणित करें।

बैंकों से इन चीज के लिए सबसे अधिक लोन मिलता है

सरकारी और प्राइवेट बैंक वर्तमान में अधिक से अधिक लोन देने के लिए प्रयास कर रहे हैं। इसका एक है आर्थिक मंदी। आर्थिक मंदी होने के कारण भारतीय अर्थव्यवस्था सुस्त पड़ी है। अर्थव्यवस्था में तेजी लाने के लिए केन्द्र सरकार की तरफ से निर्देश है की बैंक लोन देने में कोताही न करें।

जहां तक बैंकों द्वारा अधिक लोन देने की कैटेगरी की बात है तो सरकारी बैनों से होम लोन बहुत अधिक की संख्या में दिया जा रहा है। वहीं प्राइवेट बैंक अभी भी पर्सनल लोन देने में पहले स्थान पर बने हुए हैं।

तीसरी एक कैटेगरी है बिजनेस लोन। बिजनेस लोन देने में सरकारी – प्राइवेट बैंकों के साथ नॉन बैंकिंग फाइनेंशियल कंपनी – एनबीएफसी भी टक्कर में हैं।

टेक संचालित फिनटेक होने के चलते एनबीएफसी बिजनेस लोन की प्रक्रिया बहुत तेजी से कम्प्लीट करती हैं। इस लिए जब कारोबारियों को बिजनेस लोन की जरूरत होती है तब वह एनबीएफसी के तरफ रुख करते हैं।

ZipLoan से मिलता है सिर्फ 3 दिन* में बिजनेस लोन

एनबीएफसी क्षेत्र की प्रमुख आरबीआई रजिस्टर्ड कंपनी ZipLoan द्वारा कारोबारियों को सिर्फ 3 दिन* में बिना कुछ गिरवी रखे बिजनेस लोन प्रदान किया जाता है।

ZipLoan से बिजनेस लोन लेने का सबसे बड़ा लाभ यह है कि बिजनेस लोन 6 महीने बाद प्री पेमेंट चार्जेस फ्री है। बिजनेस लोन प्राप्त करने की शर्तें निम्न हैं:

  • बिजनेस लोन दो से अधिक पुराना हो।
  • बिजनेस का सालाना टर्नओवर 5 लाख से अधिक हो।
  • सालाना आईटीआर डेढ़ लाख से अधिक की फाइल होती हो।
  • घर या बिजनेस की जगह में से कोई एक खुद के नाम पर हो। (यह माता – पिता, भाई – बहन, पति – पत्नी, पुत्र – पुत्री के नाम पर हो तब भी मान्य किया जाता है।)